’’धरती की सेहत सुधारेगी नई तकनीक: नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, हरी खाद एवं बीजीए अपनाए किसान’’
’’1 से 30 जून तक कृषि विभाग चलाएगा खेत बचाओ अभियान’’*
कवर्धा, 01 जून 2026। कबीरधाम कृषि विभाग ने किसानों को रासायनिक उर्वरकों के विकल्प के रूप में हरी खाद के रूप में ढैंचा (सेसबेनिया)/मूंग के उपयोग की अपील की है। हरी खाद, ढैंचा/मूंग अपनाकर किसान प्रति हेक्टेयर दो से तीन बोरी यूरिया की बचत करने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता में भी उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। ढैंचा/मूंग एक दलहनी हरी खाद फसल है, जिसमें वायुमंडल से नाइट्रोजन ग्रहण कर उसे भूमि में स्थिर करने की अद्भुत क्षमता होती है। यही कारण है कि इसे प्राकृतिक नाइट्रोजन बैंक भी कहा जाता है। ढैंचा/मूंग के उपयोग से खेतों में जैविक कार्बन बढ़ता है, मिट्टी की संरचना सुधरती है और फसलों को आवश्यक पोषक तत्व स्वाभाविक रूप से उपलब्ध होते हैं। हरी खाद के रूप में ढैंचा/मूंग का उपयोग करने से प्रति हेक्टेयर लगभग 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन मिट्टी को प्राप्त होती है। इतनी मात्रा में नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए किसानों को सामान्यतः 90 से 130 किलोग्राम यूरिया का उपयोग करना पड़ता है।
इस प्रकार ढैंचा/मूंग सीधे तौर पर दो से तीन बोरी यूरिया की बचत कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक खाद के उपयोग से खाद का अधिकांश हिस्सा मिट्टी में ही पड़ा रह जाता है, जिससे जमीन कठोर एवं अम्लीय हो जाता है। इसके विपरीत नैनो यूरिया, नैनो डीएपी के उपयोग से तरल होने के कारण सीधे पौधे के पत्तियों पर छिड़काव किया जाता है। नैनो यूरिया, नैनो डीएपी के उपयोग से जमीन पर दुष्प्रभाव नही होता है, यह सीधे पौधे के पत्तियों द्वारा सोख लिया जाता है, जिससे मिट्टी में हानिकारक रसायनों का संचय नही होता है एवं भू-जल प्रदूषण से बचा जा सकता है। इस वर्ष जिले में नैनो यूरिया-10000 एवं नैनो डीएपी-30000 बॉटल का वितरण का लक्ष्य रखा गया है।
इसी प्रकार धान की खेती के लिए नील हरित शैवाल (बीजीए) एक वरदान है, यह हवा से नाइट्रोजन लेकर उसे मिट्टी में स्थिर करता है। प्रति हेक्टेयर 25-30 कि.ग्रा. रासायनिक नाईट्रोजन की बचत करता है एवं मिट्टी में केचुए एवं अन्य लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ती है।
खेत बचाओ अभियान दिनांक 01 जून से 30 जून 2026 तक आयोजित किया जा रहा है, जिसमें कृषि विभाग द्वारा रसायनिक उर्वरकों का कम उपयोग करते हुये नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, जीवामृत, घनामृत, पंचगव्य, हरी खाद तथा प्राकृतिक खेती को अपनाने हेतु व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है, ताकि आने वाले समय में रासायनिक उर्वरकों के उपयोगिता को कम करते हुये मिट्टी की उपजाऊ क्षमता एवं उत्पादन में वृद्धि किया जा सके।


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